जानकारी के अनुसार संबंधित भूमि पर प्लाटिंग, भूखंडों का सीमांकन, आंतरिक मार्गों का निर्माण एवं प्लाटों के विक्रय की गतिविधियां संचालित होने की शिकायतें हैं। इसके बावजूद नगर निगम की ओर से न तो कार्रवाई की कोई जानकारी सामने आई है और न ही ऐसा कोई कदम दिखाई दिया है, जिससे इन गतिविधियों पर रोक लगती नजर आए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मामला नगर निगम के संज्ञान में है, शिकायतें विभाग तक पहुंच चुकी हैं और समाचारों के माध्यम से भी तथ्य सार्वजनिक हो चुके हैं, तब आखिर कार्रवाई किस कारण से लंबित है? क्या नगर निगम के नियम केवल छोटे निर्माण कार्यों तक सीमित हैं, या फिर बड़े मामलों में कार्रवाई के पैमाने बदल जाते हैं?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शहर में छोटे-छोटे निर्माणों पर तत्काल नोटिस जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन खिरहनी के खसरा नम्बर 557/3 जैसे मामलों में नगर निगम की चुप्पी समझ से परे है। इससे विभाग की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब यह मामला केवल अवैध प्लाटिंग का नहीं, बल्कि नगर निगम की जवाबदेही का भी बन गया है। सवाल यह है कि आखिर नगर निगम कब जागेगा और कब अपने अधिकारों का उपयोग कर नियमों का पालन सुनिश्चित करेगा? या फिर खबरें और शिकायतें यूं ही फाइलों में दबी रह जाएंगी।
(यदि नगर निगम इस मामले में अपना पक्ष या की गई कार्रवाई की जानकारी उपलब्ध कराता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)
